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क्या हम सच में अपने बच्चों को सुन पा रहे हैं? प्रियांशु श्रीवास्तव की दर्दनाक चीख और खोखली उम्मीदों की भारी कीमत
वास्तव में यह कहानी केवल प्रियांशु की नहीं है; यह उस हर युवक की है जो हर दिन घर की चारदीवारी के अंदर मानसिक घुटन, बेवजह के दबाव और 'लोग क्या कहेंगे' वाले जहरीले माहौल से लड़ रहा है।
हमें बचपन से सिखाया जाता है कि माता-पिता भगवान हैं, लेकिन क्या अनुशासन के नाम पर किसी की आत्मा को कुचल देना सही है? प्रियांशु के पत्र का एक-एक शब्द चीख-चीख कर कह रहा है कि जब घर ही सबसे असुरक्षित जगह बन जाए, तो इंसान कहाँ जाए? 23 साल की उम्र में वह अपनी जिंदगी नहीं हारना चाहता था, वह उस 'जिल्लत'
Apr 233 min read
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