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क्या हम सच में अपने बच्चों को सुन पा रहे हैं? प्रियांशु श्रीवास्तव की दर्दनाक चीख और खोखली उम्मीदों की भारी कीमत

Are We Really Listening Our Children

क्या हम अपने बच्चों को सुन पा रहे हैं?


कानपुर के प्रियांशु श्रीवास्तव का अंतिम पत्र केवल एक सुसाइड नोट नहीं, बल्कि हमारे समाज के खोखलेपन और माता-पिता की अत्यधिक उम्मीदों के बोझ तले दबते बचपन की एक चीख है। 23 साल का एक नौजवान, जो कानून की पढ़ाई पूरी कर चुका था और आत्मनिर्भर बनने की पूरी कोशिश कर रहा था, वह वर्षों से मानसिक प्रताड़ना और अपमान के जिस चक्रव्यूह में फंसा था, उसे पढ़कर रूह कांप जाती है। बचपन में एक छोटी सी गलती पर घर से निकाले जाने का डर हो या बड़े होने पर हर मिनट का हिसाब देने की मजबूरी—जब घर 'सुकून' के बजाय 'जंग का मैदान' बन जाए, तो मासूम मन कहाँ जाए? प्रियांशु ने अपनी पूरी ताकत लगाई, ट्यूशन पढ़ाया, ऑनलाइन काम किया ताकि परिवार पर बोझ न बने, लेकिन फिर भी उसे बदले में केवल गालियां और सार्वजनिक अपमान मिला। आज वह हार गया, लेकिन उसकी हार ने हमारे सामने कई सवाल छोड़ दिए हैं। क्या किसी परीक्षा के नंबर या करियर की पसंद एक बच्चे की जान से ज्यादा कीमती है? क्या अनुशासन के नाम पर बच्चों को मानसिक रूप से तोड़ देना जायज़ है?


Priyanshu Suicide News

माता-पिता को चाहिए कि अपने बच्चों के साथ ऐसा रिश्ता विकसित करें जहाँ वे अपनी विफलता या डर आपसे बिना झिझक साझा कर सकें। यदि बच्चा आपसे बात करने के बजाय आपसे डरने लगे, तो समझ लीजिए कि दूरियाँ बढ़ रही हैं। केवल अच्छे नंबर या सरकारी नौकरी ही जीवन नहीं है। बच्चे की मानसिक शांति और उसकी खुशी को उसकी उपलब्धियों से ऊपर रखें। दबाव में चुने गए करियर अक्सर तनाव का कारण बनते हैं।


यदि बच्चा गुमसुम है, चिड़चिड़ा हो रहा है या आपसे दूर भाग रहा है, तो इसे 'बदतमीजी' समझने के बजाय उसके मानसिक तनाव को समझने की कोशिश करें। जरूरत पड़े तो प्रोफेशनल काउंसलर की मदद लें।


याद रखिये, आपकी एक डांट या कठोरता बच्चे के मन में गहरे घाव कर सकती है। प्रियांशु ने जो लिखा वह एक सबक है—"अपने बच्चों पर उतना ही दबाव डालें जितना वे बर्दाश्त कर सकें, नहीं तो घर-घर में प्रियांशु पैदा होंगे।" समय रहते चेतें, इससे पहले कि बहुत देर हो जाए।


Priyanshu Suicide Note

आज के युवकों को क्या कहें?


वास्तव में यह कहानी केवल प्रियांशु की नहीं है; यह उस हर युवक की है जो हर दिन घर की चारदीवारी के अंदर मानसिक घुटन, बेवजह के दबाव और 'लोग क्या कहेंगे' वाले जहरीले माहौल से लड़ रहा है।


हमें बचपन से सिखाया जाता है कि माता-पिता भगवान हैं, लेकिन क्या अनुशासन के नाम पर किसी की आत्मा को कुचल देना सही है? प्रियांशु के पत्र का एक-एक शब्द चीख-चीख कर कह रहा है कि जब घर ही सबसे असुरक्षित जगह बन जाए, तो इंसान कहाँ जाए? 23 साल की उम्र में वह अपनी जिंदगी नहीं हारना चाहता था, वह उस 'जिल्लत' से हार गया जो उसे हर रोज अपनों से मिल रही थी। समाज को समझना चाहिए कि हमारे मानसिक स्वास्थ्य की कीमत किसी भी डिग्री या पैसे से ऊपर है।


आज युवकों को चाहिए कि अगर वो भी ऐसे ही किसी दौर से गुजर रहे हैं, घर में आपकी बात नहीं सुनी जा रही, तो बाहर ऐसे लोग और दोस्त जरूर होंगे जो आपकी स्थिति को समझेंगे। अपनी बात साझा करना कमजोरी नहीं, बहादुरी है। आपके माता-पिता की उम्मीदें अपनी जगह हैं, लेकिन आपकी जिंदगी आपकी है। किसी एक परीक्षा के नंबर या किसी की डांट यह तय नहीं करती कि आप 'नाकाबिल' हैं।


अगर घुटन बर्दाश्त से बाहर हो जाए, तो किसी मेंटर, सरकारी हेल्पलाइन, Daaman की हेल्पलाइन #8882498498 या प्रोफेशनल की मदद लें। भाग जाना या हार मान लेना समाधान नहीं है; खुद को उस जहरीले माहौल से बाहर निकालने के रास्ते तलाशें।


समाज को भी इस 'टॉक्सिक' माहौल के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए, अपने बच्चों/युवकों के लिए भी और उनके जैसे हजारों प्रियांशुओं के लिए भी।

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