साली बोली - जीजा ने सपने में छेड़ा था, अदालत ने किया बरी
- Anupam Dubey
- Mar 11
- 2 min read

आज के समाचार पत्र में प्रकाशित कानपुर का यह मामला हमारी न्याय व्यवस्था और सामाजिक ढांचे पर कई गंभीर प्रश्न खड़े करता है। एक एयरफोर्स कर्मी को अपनी ही नाबालिग साली द्वारा लगाए गए छेड़खानी के आरोप में 19 दिन जेल में बिताने पड़े और सात साल तक कोर्ट के चक्कर काटने पड़े। अंत में जब फैसला आया, तो आधार क्या था? यह कि पीड़िता ने वह सब 'सपने' में देखा था और दवा के असर के कारण उसे 'भ्रम' हो गया था। यह घटना उस कड़वी सच्चाई को उजागर करती है जिसके बारे में अक्सर बात करने से बचा जाता है—क्या हमारी न्यायपालिका केवल भावनाओं और एकतरफा बयानों के आधार पर किसी निर्दोष का जीवन बर्बाद होने दे सकती है?
सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनेकों आदेशों में स्थापित किया गया दृष्टिकोण कि "पीड़िता की मौखिक गवाही ही किसी को सजा कराने दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त है," आज के समय में आत्मघाती सिद्ध हो रहा है। हम 18वीं सदी की उस दुनिया में नहीं रह रहे जहाँ यह माना जाता था कि कोई महिला कभी झूठा आरोप नहीं लगा सकती। आज के दौर में निजी रंजिश, भ्रम या क्षणिक आवेश में लगाए गए आरोपों के कारण एक सम्मानित नागरिक का करियर, प्रतिष्ठा और मानसिक शांति दांव पर लग जाती है। 498A जैसे कानूनों के दुरुपयोग की तरह ही, अब यौन अपराधों से जुड़ी धाराओं का भी सरलीकरण हो गया है, जहाँ बिना किसी ठोस साक्ष्य या मेडिकल रिपोर्ट के, केवल बयान के आधार पर गिरफ्तारियां और लंबी कानूनी लड़ाइयां शुरू हो जाती हैं।
न्यायपालिका को अब 'प्रैक्टिकल' होने की सख्त आवश्यकता है। जब एक पक्ष का बयान ही सजा का एकमात्र आधार बन जाता है, तो वहां न्याय की गुंजाइश समाप्त और अन्याय अवश्यंभावी हो जाता है। क्या हमारी व्यवस्था में उन लोगों के लिए कोई दंड निर्धारित नहीं होना चाहिए जो अपनी निजी रंजिश या लापरवाही से किसी का जीवन अधर में लटका देते हैं?
क्या 7 साल बाद मिली 'बाइज्जत बरी' की डिग्री उस एयरफोर्स कर्मी के उन छीने हुए सालों और सामाजिक अपमान का मुआवजा हो सकती है? असली अपराधी कौन—आरोप लगाने वाला या वह व्यवस्था जिसने बिना जांच के उसे जेल भेजा?
अदालतें आज भी इस 18वीं सदी के तर्क पर क्यों टिकी हैं कि 'महिला कभी झूठ नहीं बोलती'? क्या हम एक ऐसे समाज में नहीं रह रहे जहाँ कानून का इस्तेमाल अब सुरक्षा के बजाय 'ब्लैकमेल' के लिए अधिक होने लगा है?
अगर एक पुरुष पर झूठा आरोप सिद्ध होता है, तो शिकायतकर्ता को वैसी ही सजा क्यों नहीं मिलती जैसी सजा उस पुरुष को मिलती अगर आरोप सच होता? क्या 'कानून के सामने समानता' केवल किताबों तक सीमित है?
इस केस में न्यायाधीश ने 'भ्रम' या 'सपना' जैसे आधारों को स्वीकार किया। क्या न्यायाधीशों को ऐसे 'सेंटीमेंटल' फैसलों के लिए जवाबदेह नहीं ठहराया जाना चाहिए जो एक निर्दोष का करियर तबाह कर देते हैं?
धारा 498A के बाद अब अन्य गंभीर धाराओं का जिस तरह दुरूपयोग हुआ है, क्या आपको नहीं लगता कि अब 'निर्दोष' होने से ज्यादा 'प्रभावशाली' होना न्याय पाने के लिए सबसे जरूरी हो गया है?



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